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About Mastnath Math

Shri Baba Mastnath Math Asthal Bohar

मस्तनाथ मठ: भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व की संत परंपरा में नाथ संप्रदाय का अद्वितीय स्थान है। इस संप्रदाय की विश्वसनीयता का मूल कारण इस संप्रदाय के अनुयायी और संतों द्वारा किए गए जनकल्याण कार्य हैं। आदिकाल से ही नाथ संप्रदाय का मुख्य उद्देश्य प्राणिमात्र के कष्टों का निवारण रहा है। इसलिए नाथ संप्रदाय के उपासक विश्व के प्रत्येक कोने में स्थित हैं। आदिनाथ भगवान शिव शंकर इस संप्रदाय के प्रवर्तक हैं। इस संप्रदाय से जुड़े अनेक सिद्ध योगी, महात्माओं ने अपनी अष्ट सिद्ध और नव निधियों के माध्यम से राष्ट्रधर्म और जनकल्याण के अनेक कार्य किए हैं। भगवान् शंकर से प्रारंभ इस संप्रदाय में मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, मस्तनाथ, जालंधरनाथ, कानीफनाथ, चैरंगीनाथ, चर्पटीनाथ, भर्तृहरिनाथ, गोपीचन्दनाथ, रत्ननाथ, धर्मनाथ एवं नवनाथ चैरासी सिद्ध आदि अनेक महान् योगेश्वर सिद्ध हुए हैं। इन महासिद्ध योगियों ने हठयोग साधना के साथ-साथ कर्मयोग साधना, सनातन परंपरा, राष्ट्रप्रेम आराधना का वहन किया जिसके फलस्वरूप भारत की सभ्यता और संस्कृति की सुरक्षा में इनका अद्वितीय योगदान रहा है।

भगवान आदिनाथ ने सर्वप्रथम कनफड़ा योगियों की परंपरा को प्रारंभ किया। इस परंपरा में महायोगी मत्स्येन्द्रनाथ और उनके शिष्य महायोगी गोरक्षनाथ जी ने हठयोग की साधना को प्रचारित एवं प्रसारित कर काया शोधन विधि के विषय में ज्ञान देते हुए यह भी बताया कि आसनों के माध्यम से संयत जीवन कैसे व्यतीत किया जा सकता है। आठवीं शताब्दी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ ‘हर्षचरित’ और उससे भी पूर्ववर्ती ग्रंथों; जैसे- कादंबरी, मैत्रेयी उपनिषद् और पुराणों में भी कनफड़ा योगियों के अनेक उल्लेख प्राप्त होते हैं, जो नाथ संप्रदाय के अत्यंत प्राचीन होने के प्रमुख प्रमाण माने जाते हैं। लोकहित के कार्यों के कारण ही वर्तमान समय में नाथ संप्रदाय अफगानिस्तान, तिब्बत तथा चीन तक फैला हुआ है।

तिब्बत के तंजूर मठ तथा चीन के बौद्ध विहारों में सिद्ध संप्रदाय के अनेक सिद्धों की कीर्ति गाथाएँ आज भी सुरक्षित हैं। वहाँ के उपलब्ध साहित्य से यह प्रमाणित होता है कि अस्थल बोहर मठ के आदि संस्थापक महासिद्ध शिरोमणि चैरंगीनाथ जी तिब्बत, चीन आदि देशों में महासिद्ध चैरंगीपा के नाम से अत्यंत लोक प्रसिद्ध थे। उनका यश वहाँ आज भी फैला हुआ है। लोकगीत, सांग, किस्से और कहानियाँ इस बात को प्रमाणित करते हैं। अस्थल बोहर मठ के आदि संस्थापक महासिद्ध शिरोमणि चैरंगीनाथ जी महाराज हुए हैं। वे सियालकोट के राजा शालिवाहन की बड़ी रानी के सुपुत्र हुए जो संसार में पूर्णभगत के नाम से विख्यात हुए। वे मत्स्येन्द्रनाथ जी को गुरु धारण करके नाथ संप्रदाय में दीक्षित हुए। गुरु परंपरा का निर्वहन करते हुए सिद्ध शिरोमणि चैरंगीनाथ ने आठवीं शताब्दी में अस्थल बोहर मठ की स्थापना की।

कालक्रम से विध्वस्त हुए इस मठ का 18वीं शताब्दी में पुनः जीर्णोद्धार परम सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी महाराज ने करवाया। परम सिद्धेश्वर बाबा मस्तनाथ जी ने योग-सिद्धि, तपस्या तथा चमत्कारों से समस्त जनमानस को प्रभावित कर इसकी समृद्धि और श्रीवृद्धि को चरम सीमा तक पहुँचाया। वे साक्षात् भगवान श्री गोरक्षनाथ जी के अवतार थे। मठ अस्थल बोहर में आकर बाबा मस्तनाथ जी ने अपनी धूणी रमाई। इस प्रकार अस्थल बोहर मठ एवं गद्दी सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी को पाकर धन्य एवं पूजनीय हो गई।

अस्थल बोहर मठ के पूजनीय महंतों का जनकल्याण, शिक्षा, चिकित्सा और राष्ट्रसेवा में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, जिनमें निम्न महंत उल्लेखनीय हैं:

  • श्रीयुत् तोतानाथ जी महाराज
  • श्रीयुत् मेघनाथ जी महाराज
  • श्रीयुत् मोहरनाथ जी महाराज
  • श्रीयुत् चेतनाथ जी महाराज
  • श्रीयुत् पूर्णनाथ जी महाराज
  • श्रीयुत् श्रेयोनाथ जी महाराज
  • श्रीयुत् चाँदनाथ जी महाराज

वर्तमान समय में श्री बाबा मस्तनाथ जी की समाधि मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया जा रहा है। इस समाधि मंदिर का निर्माण 60 एकड़ भूमि पर किया जा रहा है, जिसमें 5 लाख 50 हजार घन फीट पत्थर का इस्तेमाल किया जाएगा। यह समाधि मंदिर भारत में ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व में एक ऐतिहासिक धरोहर स्वरूप स्थापत्य एवं वास्तुकला का गौरव बनेगा।

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